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Ram Narain vs. Mohammad Jaffar& Ors.

Final Order
Court:High Court of Rajasthan (Jaipur Bench)
Judge:Hon'ble Prashant Kumar Agarwal
Case Status:Unknown Status
Order Date:29 Sept 2014
CNR:RJHC020312772002

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Order Issued After Hearing

Purpose:

Disposed

Before:

Hon'ble Prashant Kumar Agarwal

Listed On:

29 Sept 2014

Order Text

<u>राजस्थान उच्च न्यायालय जयपुर पीठ जयपुर</u> <u>निर्णय</u>

एकलपीठ सिविल विविध अपील संख्या-456/2002

Aराम नारायण G

मोहम्मद जफर एवं अन्य

निर्णय दिनांक :

29 सितम्बर, 2014

: उपस्थित :

<u>माननीय न्यायाधिपति श्री प्रशान्त कुमार अग्रवाल</u>

  • श्री अक्षय शर्मा, अधिवक्ता वास्ते
  • श्री अश्विन गर्ग, अधिवक्ता-दावेदार-अपीलार्थी की ओर से
  • श्री अतुल कुमार जैन, अधिवक्ता- प्रत्यार्थी संख्या-2 की ओर से
  • श्री गौरॅव जैंन, अधिवक्ता प्रत्यार्थी संख्या-3 बीमा कम्पनी की ओर से

मोटर दुर्घटना वाद न्यायाधिकरण, टोंक द्वारा मोटर दुर्घटना वाद संख्या-1704/2001 में दिनांक 06.11.2001 को पारित निर्णय व अवार्ड के माध्यम से अपीलार्थी-दावेदार को क्षतिपूर्ति के रूप में प्रदान की गई राशि की मात्रा से असंतुष्ट होकर तथा उसमें समुचित रूप से बढ़ौतरी किये जाने की प्रार्थना के साथ यह दीवानी विविध अपील अपीलार्थी-दावेदार ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा-173 के अधीन प्रस्तुत की है।

उक्त अपील के निस्तारण हेतु सुसंगत तथ्य संक्षेप में इस तरह से है कि अपीलार्थी-दावेदार ने अधिनियम की धारा-166 के अधीन क्लेम याचिका इन कथनों के साथ प्रस्तुत की, कि दिनांक 24.02.1997 को प्रात:काल 7 बजे वह सवाई माधोपुर रोड़ स्थित चुंगी नाका पर अपनी मोटर साइकिल एम-80 पर दूध के ड्रम लटकाकर दूध विक्रय करने हेतु टोंक की ओर आ रहा था तो सामने से प्रत्यार्थी संख्या-1 मोहम्मद जफर अपने वाहन जीप पंजीकरण संख्या-आर.आर.टी. 7510 को गफलत, लापरवाही व तेज गति से चलाते हुए लाया तथा अपीलार्थी की मोटर साइकिल के टक्कर मारी जिसके फलस्वरूप अपीलार्थी के शरीर के अनेक अंगों पर साधारण व गम्भीर प्रकृति की चोटें कारित हुई। अपीलार्थी ने दूध विक्रय एवं कृषि कार्य कर प्रतिमाह 10 हजार रूपये अपनी आय प्रकट कर क्षतिपूर्ति के रूप में 11 लाख 99 हजार रूपये की मांग की। प्रत्यार्थीगण ने लिखित प्रति उत्तर प्रस्तुत कर अन्य के अलावा यह कथन भी किया कि मामला अंशदायी लापरवाही का भी है क्योंकि एम-80 मोटर साइकिल दूध के ड्रम लाने ले जाने हेतु निर्मित नहीं की गयी है। उनकी ओर से यह भी आपत्ति ली गयी कि दुर्घटना के समय अपीलार्थी-दावेदार के पास मोटर साइकिल सहित किसी भी तरह का वाहन चलाने का वैध व प्रभावी अनुज्ञा पत्र नहीं था।

पक्षकारों की ओर से प्रस्तुत अभिवचनों के आधार पर विद्वान् न्यायाधिकरण ने आवश्यक वाद बिन्दुओं की रचना की। वाद बिन्दु संख्या-1 के अधीन विस्तार से विचार कर न्यायाधिकरण द्वारा निष्कर्ष दिया गया कि दुर्घटना के समय अपीलार्थी-दावेदार के पास स्वीकृत रूप से किसी भी तरह का वाहन चलाने का वैध एवं प्रभावी अनुज्ञा पत्र नहीं था तथा दुर्घटना के समय वह उक्त मोटर साइकिल पर दूध के इम लटकाकर एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर जा रहा था जबकि उक्त मोटर साइकिल दूध के ड्रम लटकाकर चलाने के लिए निर्मित नहीं होती है, ऐसी सूरत में दुई्टना कारित होने में स्वंय अपीलार्थी-दावेदार की भी गफलत व लापरवाही रही है। विद्वान् न्यायाधिकरण ने अपीलार्थी-दावेदार की 25 प्रतिशत अंशदायी लापरवाही निर्धारित की । क्षतिपूर्ति राशि की मात्रा के सम्बन्ध में विद्वान् न्यायाधिकरण ने वाद बिन्दु संख्या-3 व 7 के अधीन विचार करते हुए तथा अपीलार्थी के 40 प्रतिशत स्थायी अयोग्यता उत्पन्न होना मानकर आय की क्षति के मद में एक मुश्त 2 लाख रूपये तथा अन्य विभिन्न मदों के अधीन कुल 01 लाख रूपये दिलाते हुए कुल 3 लाख रूपये क्षतिपूर्ति के रूप में निर्धारित करते हुए उसमें अपीलार्थी की अंशदायी योगदान के आधार पर कटौती करते हुए कुल 2 लाख 25 हजार रूपये क्षतिपूर्ति राशि के रूप में निर्धारित किये। विद्वान् न्यायाधिकरण ने उक्त राशि 2 लाख 25 हजार रूपये पर क्लेम याचिका प्रस्तुत की तिथि से अदायगी की तिथि तक 9 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज भी दिलाया है। न्यायाधिकरण द्वारा दिलायी गई राशि की मात्रा से असंतुष्ट होकर यह अपील पेश की गयी है।

अधिवक्ता अपीलार्थी ने अपील के समर्थन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये :-

    1. पत्रावली पर ऐसी कोई साक्ष्य विधमान नहीं है जिससे प्रथम दृष्टया भी दर्शित होता हो कि दुर्घटना कारित करने में अपीलार्थी की भी किसी तरह की कोई गफलत व लापरवाही रही हो, केवल इस आधार पर अपीलार्थी की गफलत व लापरवाही नहीं मानी जा सकती कि दुर्घटना के समय उसके पास मोटर साइकिल सहित किसी भी तरह का वाहन चलाने का वैध एवं प्रभावी अनुज्ञा पत्र नहीं था तथा अपीलार्थी द्वारा अपनी उक्त मोटर साइकिल का उपयोग उस पर दूध से भरे ड्रम लटकाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए किया जा रहा था। पत्रावली पर विधमान साक्ष्य से जाहिर है कि सामने से उक्त जीप को तेज गति से आता हुआ देखकर अपीलार्थी ने अपनी मोटर साइकिल को सही साइड में कच्चे में उतार लिया था किन्तु फिर भी जीप के चालक ने अपने वाहन को तेज गति, गफलत व लापरवाही से चलाते हुए कच्चे में आकर अपीलार्थी की मोटर साइकिल के टक्कर मारी। अतः विद्वान् न्यायाधिकरण का यह निष्कर्ष कतई गलत है कि दुर्घटना में अपीलार्थी का अंशदायी योगदान 25 प्रतिशत रहा है, ऐसी सूरत में क्षतिपूर्ति राशि की गणना केवल जीप चालक को दुर्घटना के लिए दोषी मानकर किया जाना चाहिए।
    1. विद्वान् न्यायाधिकरण ने यघपि इस तथ्य को स्वीकार किया है कि दुर्घटना में आयी चोटों के फलस्वरूप अपीलार्थी के 40 प्रतिशत स्थायी अपंगता उत्पन्न हुई किन्तु फिर भी आय की क्षति के मद के अधीन एक मुश्त 2 लाख रूपये दिलवाये हैं जबकि प्रचलित सुस्थापित विधिक स्थिति की रोशनी में अपीलार्थी की मासिक आय में 50 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए तथा प्रार्थी की तत्समय आयु 35 वर्ष के आधार पर उपयुक्त गुणांक का उपयोग करते हुए आय की क्षति की गणना की जानी चाहिए। अधिवक्ता के अनुसार अपीलार्थी ने क्लेम याचिका में अपनी मासिक आय 3 हजार रूपये प्रकट की है, ऐसी सूरत में इस राशि में 1500/- रूपये जौड़कर प्रतिमाह आय 4500/-रूपये निर्धारित करते हुए तथा अपीलार्थी की तत्समय आयु 35 वर्ष के अनुसार 16 के गुणांक का उपयोग करते हुए राशि की गणना की जानी चाहिए थी।
  1. दुर्धटना के फलस्वरूप अपीलार्थी को उत्पन्न हुई 40 प्रतिशत स्थायी अयोग्यता को ध्यान में रखते हुए भविष्य में सम्भावित रूप से कराये जाने वाले इलाज के मद के अधीन भी उपयुक्त राशि क्षतिपूर्ति के रूप में दिलवायी जानी चाहिए थी किन्तु विद्वान् न्यायाधिकरण ने इस मद के अधीन कुछ भी राशि प्रदान नहीं की है।

  2. अन्य मदों के अधीन दिलायी गयी राशि भी प्रकरण के तथ्यों व परिस्थितियों तथा अपीलार्थी को उत्पन्न हुई स्थायी अयोग्यता के प्रतिशत की रोशनी में अपर्याप्त एवं अनुउपयुक्त है, जिसमें भी उपयुक्त रूप से बढ़ौतरी की जानी चाहिए।

इसके विपरीत योग्य अधिवक्ता प्रत्यार्थीगण ने अपीलाधीन निर्णय व अवार्ड का समर्थन करते हुए तर्क प्रस्तुत किया कि विद्वान् न्यायाधिकरण ने पत्रावली पर विधमान साक्ष्य तथा स्वयं अपीलार्थी द्वारा की गयी स्वीकारोक्तियों के आधार पर सही रूप से निष्कर्ष दिया है कि दुर्घटना कारित होने में अपीलार्थी का भी अंशदायी योगदान रहा है। विद्वान् न्यायाधिकरण ने सही रूप से अपीलार्थी का योगदान 25 प्रतिशत निर्धारित किया है। अधिवक्ता प्रत्यार्थीगण का यह भी तर्क है कि यधपि विद्वान् न्यायाधिकरण ने यह स्वीकार किया है कि अपीलार्थी को 40 प्रतिशत स्थायी अयोग्यता उपन्न हुई है किन्तु अपीलार्थी की ओर से ऐसी कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की गयी है, जिससे यह माना जा सके कि अपीलार्थी future prospects के अधीन किसी तरह की राशि प्राप्त करने का अधिकारी है तथा क्षतिपूर्ति राशि की गणना future prospects को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए था।

हमने विद्वान् अधिवक्तागण पक्षकारान् की ओर से प्रस्तुत तर्कों पर विचार किया तथा पत्रावली पर विधमान अभिवचनों व साक्ष्य , सम्बन्धित विधिक प्रावधानों तथा मोटर दुर्घटना में किसी व्यक्ति को आयी चोटों के फलस्वरूप क्षतिपूर्ति निर्धारण के लिए माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायिक दृष्टान्त संजय कुमार बनाम अशोक कुमार एवं अन्य 2014(5) एस.सी.सी. 330 तथा राजकुमार बनाम अजय कुमार एवं अन्य 2011(1) एस.सी.सी. 343 का भी ध्यानपूर्वक अवलोकन किया। हमारा सविचार निर्णय व निष्कर्ष निम्न प्रकार है :-

    1. यह स्वीकृत तथ्य है कि दुर्घटना के समय अपीलार्थी-दावेदार अपनी मोटर साइकिल एम-80 पर दूध से भरे हुए ड्रम लटकाकर एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर जा रहा था तथा उस समय उसके पास मोटर साइकिल सहित किसी भी तरह का वाहन चलाने का वैध एवं प्रभावी अनुज्ञा पत्र नहीं था। यह स्वीकृत स्थिति है कि वाहन मोटर साइकिल एम-80 का निर्माण दूध से भरे हुए ड्रमों सहित किसी भी सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान के लिए ले जाने के लिए नहीं किया गया तथा इसका उपयोग अधिक से अधिक दो सवारियों के परिवहन के लिए ही किया जा सकता है। उक्त स्वीकृत स्थिति में विद्वान् न्यायाधिकरण के इस निष्कर्ष को गलत व अनुचित नहीं माना जा सकता कि दुर्घटना घटित होने में अपीलार्थी का भी अंशदायी योगदान रहा है। विद्वान् न्यायाधिकरण के इस निष्कर्ष को भी गलत व अनुचित नहीं माना जा सकता कि दुर्घटना के लिए अपीलार्थी 25 प्रतिशत की सीमा तक उत्तरदायी है, ऐसी सूरत में विद्वान् न्यायाधिकरण ने अपने द्वारा निर्धारित की गयी क्षतिपूर्ति राशि में से 1⁄4 भाग की कटौती करने में भी किसी तरह की कोई अनियमितता नहीं की है तथा इस सम्बन्ध में विद्वान् न्यायाधिकरण का निष्कर्ष विधि सम्मत होने से पुष्ट किये जाने योग्य है।
    1. हम अधिवक्ता अपीलार्थी के इस तर्क से सहमत हैं कि आय की क्षति के मद में एक मुश्त 2 लाख रूपये दिलाये जाने के स्थान पर future prospects के आधार पर 50 प्रतिशत आय में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए अपीलार्थी की आयु के अनुसार उपयुक्त गुणांक का उपयोग करते हुए उत्पन्न स्थायी अयोग्यता के अनुसार इस मद के अधीन राशि का निर्धारण किया जाना चाहिए था। यघपि अपीलार्थी ने विचारण के दौरान अपनी मासिक आय कृषि कार्य व दूध के विक्रय से 10 हजार रूपये प्रतिमाह होना बताने का प्रयास किया है किन्तु स्वयं अपीलार्थी द्वारा प्रस्तुत क्लेम याचिका में उसने अपनी प्रतिमाह आय 3 हजार रूपये प्रकट की है, ऐसी सूरत में आय में क्षति का निर्धारण अपीलार्थी की आय 3 हजार रूपये प्रतिमाह मानकर तथा दुर्घटना के समय उसकी आयु 35 वर्ष के अनुसार 50 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए किया जाना न्यायोचित है।

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सरला वर्मा वाले प्रकरण में निर्धारित किये गये मापदण्ड के अनुसार अपीलार्थी की आयु के अनुसार क्षतिपूर्ति राशि निर्धारण करने के लिए 16 के गुणांक का उपयोग में लिया जाना उचित है। यदि उक्त प्रकार से गणना की जाये तो अपीलार्थी आय की क्षति हेतु निम्न राशि प्राप्त करने का कानूनी अधिकारी है

4500 X12X16X40/100 = 3,45,000/- रूपये

    1. जहां तक सम्भावित रूप से भविष्य में अपीलार्थी द्वारा अपने इलाज में व्यय की जाने वाली राशि के मद में राशि प्रदान किये जाने का प्रश्न है, अपीलार्थी की ओर से इस सम्बन्ध में किसी तरह की कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की गयी है और न ही अपीलार्थी को उत्पन्न 40 प्रतिशत स्थायी अयोग्यता के आधार पर यह माना जा सकता है कि भविष्य में उसे निश्चित रूप से कोई न कोई राशि अपने इलाज हेतु व्यय करनी पड़ेगी, ऐसी सूरत में यदि इस मद में विद्वान् न्यायाधिकरण ने कोई राशि प्रदान नहीं की है तो उसे गलत नहीं माना जा सकता । इस सम्बन्ध में अपीलार्थी की ओर से प्रस्तुत तर्क प्रकरण के तथ्यों व परिस्थितियों की रोशनी में अस्वीकार किये जाने योग्य है।
    1. जहां तक अन्य मदों के अधीन दिलाई गई राशियों में वृद्धि किये जाने का प्रश्न है, अपीलाधीन निर्णय व अवार्ड के अवलोकन से जाहिर है कि अपीलार्थी द्वारा प्रस्तुत बिलों के आधार पर उपचार में व्यय हुई राशि के रूप में 20 हजार रूपये, विशेष आहार के मद के अधीन 15 हजार रूपये , देखभाल के व्यय के रूप में 10 हजार रूपये, चोटों के फलस्वरूप अपीलार्थी को हुई मानसिक एवं शारीरिक पीझ के अधीन 25 हजार तथा अपीलार्थी को भविष्य में होने वाली असुविधाओं, कठिनाइयों, परेशानियों एवं मानसिक तनाव के मद के अधीन 30 हजार रूपये दिलाये हैं। प्रकरण के समस्त तथ्यों व परिस्थितियों की रोशनी में हम अधिवक्ता अपीलार्थी के इस तर्क से सहमत नहीं है कि उक्त मदों के अधीन प्रदान की गयी राशि अनुउपयुक्त एवं अपर्याप्त है तथा उसमें समुचित रूप से बढ़ौतरी की जानी चाहिए।

उपरोक्त समस्त विवेचन से जाहिर है कि आय में हुई क्षति के मद के अधीन अपीलार्थी को कुल 3,45,600/- रूपये दिलाये जाने चाहिए थे जबकि विद्वान् न्यायाधिकरण ने इस मद में एक मुश्त 2 लाख रूपये ही दिलाये हैं। इस प्रकार से अपीलार्थी अतिरिक्त राशि के रूप में 1,45,600/- रूपये प्राप्त करने का अधिकारी है किन्तु उसका 25 प्रतिशत अंशदायी योगदान होने के कारण इसमें से 36,400/- रूपये की कटौती की जानी चाहिए । इस प्रकार से कटौती उपरान्त अपीलार्थी उक्त मद के अधीन 1,09,200/- रूपये अतिरिक्त रूप से प्राप्त करने का अधिकारी पाया जाता है। इस राशि पर याचिका प्रस्तुती की तिथि से अदायगी की तिथि तक 6 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज दिलाया जाना भी न्यायोचित होगा।

अतः उपरोक्त समस्त विवेचन के आधार पर अपीलार्थी-दावेदार की ओर से प्रस्तुत यह अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आय की क्षति के मद में विद्वान न्यायाधिकरण द्वारा दिलायी गयी एक मुश्त 2 लाख रूपये की क्षतिपूर्ति राशि में उपरोक्त प्रकार संशोधन कर यह आदेश दिया जाता है कि अपीलार्थी क्षतिपूर्ति राशि के रूप में अतिरिक्त रूप से 1,09,000/- रूपये तथा इस राशि पर क्लेम याचिका प्रस्तुती की तिथि से अदायगी तिथि तक 6 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज प्राप्त करने का अधिकारी है। प्रत्यार्थी- बीमा कम्पनी को आदेश एवं निर्देश दिया जाता है कि वह उक्त बढ़ी हुई राशि मय ब्याज के आज से एक माह की अवधि में विद्वान् न्यायाधिकरण के समक्ष जमा कराये।

प्रत्यार्थी-बीमा कम्पनी द्वारा राशि जमा कराये जाने पर विद्वान् न्यायाधिकरण अपीलार्थी-दावेदार को सुनवाई का अवसर देकर तथा उसकी पहचान की सुनिश्चितता कर इस राशि के वितरण के सम्बन्ध में उपयुक्त आदेश स्वयं के विवेकानुसार पारित करे। पक्षकारान् इस अपील का खर्चा अपना-अपना स्वयं वहन करे।

सम्बन्धित न्यायाधिकरण का रिकार्ड तुरन्त वापिस भिजवाया जावे।

सत्यमेव जयते प्रशान्त कुमार अग्रवाल )

अनिलशर्मा/S

<sup>&</sup>quot;all corrections made in the judgment/order have been incorporated in the judgment/order being e-mailed." अनिल शर्मा/ps

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